मंगलवार, 20 जनवरी 2009

एक यकीन जो जिन्दा है अभी


चाहता हूं एक अनुभव बांटू। वाकया लखनऊ का है। उस दिन मैं देर रात लखनऊ की सड़कों पर भटक रहा था। बदकिस्मती या फिर कहें मेरी लापरवाही से गाजियाबाद जा रही मेरी ट्रेन छूट चुकी थी। इंटरनेट टिकट था लिहाजा अंदेशा था कि एक धेला भी वापस न पा सकूंगा। कुछ देर रेलवे टिकट
खिड़की पर बेवजह की हुज्जत की और फिर देर रात शहर की सड़कों पर किसी इंटरनेट झोपड़ी को तलाशने निकल पड़ा। चन्द पैसे वापस पा लेने की एक छोटी सी आशा दरअसल उस वक्त तक मेरे साथ थी। लखनऊ अभी भी रात में आराम फरमाता है, लिहाजा महज एक इन्टरनेट की तलाश में मैं सड़कों पर बेवजह भटकता रहा। पर अचानक एक ऊंघती सी जगह मुझे नजर आयी जहां मेरी आशाओं को कुछ ठौर मिल सकता था। भीतर पहुंचा तो मालिक नुमा शख्स ने भांप लिया कि फिलहाल मेरे लिए वह भगवान है। मैं इंटरनेट की मदद से कहीं जाना चाहता था और उसने इस सफर की कीमत इतनी बढ़ा दी कि मैं भी चन्द लम्हों के लिए सकते में आ गया। बहरहाल, मैंने अपनी सीट ग्रहण की और दुनिया में प्रवेश करने के लिए तैयार हो गया। जिस समय मैं अपने पैसे बचाने की कवायद में जुटा था उस वक्त साथ आया मेरा साथी वहीं था। मेरे आस पास दो लोग और मौजूद थे जो रिमोट पर उंगलियां घुमा देश-दुनिया का जायजा लेने में जुटे थे। विज्ञापनों के बीच जब थोड़ी मोहलत मिली तो उनमें से किसी ने अपने आस-पास की दुनिया के बारे में उत्सुकता जाहिर की। परिचय के बीच जब उन्हें पता चला कि हम मीडिया की दुनिया से ताल्लुक रखते हैं तो उनका लहजा बदल गया। उपेक्षित से खड़े मित्र के लिए एक कुर्सी मंगाई गई और उसे सादर आमंत्रित किया गया। बहरहाल, जिस दरमियान मैं अपनी इंटरनेट की दुनिया में था उस वक्त मेरे आस पास एक बहस चल रही थी। इस दौरान जो शब्द मेरे कानों में पड़ा वह आज भी मुझे गर्व से भर देता है। एक आवाज कह रही थी कि "मीडिया की वजह से ही हम जिन्दा हैं"।.... उस आवाज में जो ऊष्मा थी औऱ उस आवाज से सच्चाई और विश्वास की जो महक आ रही थी दरअसल उसने मुझे उद्वेलित किया था। मेरे आस-पास उस वक्त हजारों सवाल बिखरे थे। बहस जो कर रहे थे वो हिन्दुस्तानी मुसलमान थे। ऐसे मुसलमान जो ईमान से भारतीय थे, लेकिन खुद को अपने ही देश में बेगाना पा रहे थे। अपने आस-पास बिखरे अविश्वास के माहौल से वो नाराज थे। ऐसे ढेरों सवाल उनके पास मौजूद थे जिनका जवाब न तो मेरे पास था और न ही किसी और को पास होगा। बहस के दौरान मैंने साफ महसूस किया कि अयोध्या विवाद के दौरान शासन-प्रशासन के एकतरफा रूख को जो मुसलमान बिसरा रहा था उस दर्द को गुजरात ने हरा कर दिया। दरअसल उनके तर्को का जवाब मेरे पास भी नहीं था। जुल्मों की इंतहा जो हमने की है वो किसी औरंगजेब और गजनी से बेशक कम नहीं। इतिहास बेशक हमें माफ नहीं करेगा। यह भी सच है कि अपनी लाख बुराइयों के बावजूद मीडिया ने उस दर्द, उस अन्याय के लिए आवाज उठाई थी। उस समय की निष्पक्ष तस्वीरें जो बयान कर रही थी वो किसी सभ्य समाज के लिए बेशक शर्म थी। दरअसल गुजरात के दंगों में सबसे कुपित यह करता है कि यह राज्य प्रायोजित हिंसा थी। सत्ता की सियासत के लिए एक सूबे को हिंसा में झोंक दिया गया। ....कभी- कभी इसे गोधरा की स्वाभाविक प्रतिक्रिया का तर्क देते हुए इंदिरा गांधी की हत्या के बाद हुई हिंसा से जोड़ कर देखने का तर्क दिया जाता है। लेकिन यह तर्क देते समय भूल जाया जाता है कि ८४ के दंगो पर महज तीन दिनों में काबू पा लिया गया था। लेकिन गुजरात में चल रहा नरसंहार तीन दिनों तक चलता रहा।

9 टिप्‍पणियां:

  1. आपने कहा कि एक आवाज कह रही थी कि "मीडिया की वजह से ही हम जिन्दा हैं"। अवश्य ही उस शक्स ने जोश में आकर वो बात कह दी होगी. अगर इस बात में सच्चाई रहती तो आज तो हिन्दुस्तान में एक भी मुस्लिम नहीं होता। सातवीं सदी के बाद से लेकर अब तक तो बहुसंख्यक सारे मुस्लिमों को मार चुके होते, फिर मुस्लिम अब तक बचे कैसे हैं? क्योंकि उस वक्त उनकी रक्षा के लिए मीडिया तो था ही नहीं। प्रभु! मीडिया ने किसी को नहीं बचाया, देश में बहुसंख्यकों की सहिष्णु संस्कृति की वजह से ही आज शांति है। अन्यथा मामला गंभीर होता। कृपया इसी पोस्ट के नीचे कमेंट करके चर्चा को आगे बढ़ाएं, यदि इच्छुक हों तो...

    जवाब देंहटाएं
  2. ....दोस्त!.... यह तो शायद आप मानें, कि कुछ इलाकों को अगर छोड़ दें तो आजादी के बाद प्राय: दोनों सम्प्रदायों के बीच वैमनस्य की रेखा पटने लगी थी।.....लेकिन अयोध्या के मुद्दे ने इसे एक बार फिर से सतह पर ला दिया।....गुजरात में जो कुछ हुआ, उसने तो बेशक अविश्वास बो दिया है।.....अगर आप चीजों को महसूस कर सकते हैं, तो आप जानते होंगे कि सहिष्णुता की बातें सिर्फ बातें हैं।(बातों का क्या?....क्य़ा किसी विशेष इलाके में जनसांख्यिक दृष्टि से हावी धर्म/जाति को दूसरे पर हावी होते आपने नहीं देखा है?).....क्या "मंदिर वहीं बनायेंगे" का नारा हमारी सहिष्णुता ही थी?.....गोधरा में जो कुछ हुआ वह बेशक गलत था, लेकिन उसके बाद तीन महीनों तक जो होता रहा वह क्या हमारी सहिष्णुता थी??......दोस्त!....गोधरा के बाद की हिंसा को भी आप चाहें तो जायज कह लें!!....क्योंकि भीड़ हिंदू हो या मुस्लिम स्वभाव से बर्बर होती है।....लेकिन सिस्टम का बचाव हम कैसे करेंगे?......क्या आपको नहीं लगता कि सरकार फेल हुई थी??.....दोस्त हम लोकतंन्त्र में जीते हैं!.....मोदी भले ही हिंदू हों,....बेशक वो जीते भी हिंदू मतों से होंगे।.....लेकिन जब वह मुख्यमंत्री बन जाते हैं तो राजधर्म वह नहीं कहता जो उन्होंने किया।....मतभेद कितने भी बड़े हों, जिन्दगी लील जायें इतने बड़े नहीं होते।.....आप भी चाहें तो इसे सामूहिक हत्या कह लें। मै तो उसे यही कहता हूं।

    जवाब देंहटाएं
  3. गुजरात दंगे गलत तो थे ही, उसे उचित नहीं ठहरा रहा मैं, न ही मंदिर वहीं बनाएँगे का नारा बुंलद करने वाली भीड़ का समर्थन कर रहा हूं। मेरे मन में तो मीडिया ने बचाया है वाली बात पर संशय था। अगर दिल्ली में दंगे होते हैं तो क्या आप हथियार लेकर उस भीड़ में शामिल होकर मारकाट मचाएंगे? नहीं न...इसीलिए मैं कह रहा हूं कि आप जैसे सहिष्णु और समझदार बहुसंख्यकों की वजह से ही अल्पसंख्यक सुरक्षित हैं, अन्यथा हरेक हिन्दू धर्मांध होकर मरने मारने पर उतारू हो जाता तो नतीजा क्या रहता आपको मालूम ही है। गुजरात इसका एक उदाहरण ही है। उस घटना में धर्मांध लोग सत्ता में थे तो उन्होंने क्या मारकाट मचा दी। लेकिन हर जगह तो वैसा नहीं हुआ... ऐसा भी नहीं था कि गुजरात के हर इलाके में ही मारकाट मच गई थी...। अगर ऐसा हुआ रहता तो शायद गुजरात में एक भी मुस्लिम भाई नहीं बचा होता। और फिर मीडिया दोहरे मापदंड क्यों मनाता है? अगर हिन्दू और मुस्लिम आपस में लड़ें और दो मुस्लिम मर जाएं तो खूब खबर चलती है, अल्पसंख्यक समुदाय के दो शख्स मारे गए.... और वहीं अगर कोई मुस्लिम हिन्दुओं को मार दे तो खबर न चलाना नैतिक जिम्मेदारी बन जाती है कि कहीं दंगे न हो जाएं.....
    ज़ाहिर सी बात है, या तो मीडिया भी नागरिकों को धर्म के आधार पर पहचानना बंद कर दे ( क्योंकि सरकार तो ऐसा करने से रही)।
    जहां तक अल्पसंख्यकों की बात है, किसी भी देश में अल्पसंख्यक असुरक्षित होते ही हैं। मसलन पाकिस्तान और मलेशिया आदि में हिन्दुओं के क्या हाल हैं आप बखूबी जानते हैं..। ये एक सामान्य सी बात है।

    जवाब देंहटाएं
  4. lekin bawajood uske main alpsankhyakon ke saath hone waale durvyavhaar ko jayaz nahin tehra raha....
    desh mein dange aazadi se pehle bhi hua karte the....
    aapko yaad dila doon ki 1857 ke vidroh mein Muslim netaaon ne JEHAD ke elaan kiya tha. Ye JEHAD angrezon hi nahin balki hinduon ke khilaaf bhi tha, isi tarah desh mein mugal shashan ke dauran bhi dange hote rehte the, angrezon ke shashan mein ye doori aur badh gayi, aur teesara karan ye hai ki Islam aur Hindu dharm ke principles mein paraspar virodh hai.... dono samaj ke log isiliye miljul nahi pa rahe. ...
    isi wajah se dange ho jaate hain....


    -Aadarsh Rathore
    (upar wala patrakar bhi main hi hoon)

    जवाब देंहटाएं
  5. भैया आप स्वस्तुति करके खुश हो रहे हो क्या आप कभी काशमीरी पंडितों के साथ क्या हुआ नही जानते उनके बारे में लिखने को आपकी लेखनी कितनी पैनी है कभी दिखाऔ। जामा मस्जिद के शाही इमाम का बयान शायाद आपने नही सुना या पढा जिसमें उन्होंने कहा कि भारत में हिन्दु धर्म की वजह से मुसलमान सुरक्षित हैं और यह 100% सही भी है। मीडिया क्या लोगो को बचाता है ? पत्रकारों को सनसनी खबर चाहिये होती है यदि वो लोगों को बचाने लगे तो उनकी खबर अधुरी रह जयेगी, और न तो अखबार का सम्पदक उसको छपने देगा न ही इलेक्ट्रोनिक मीडिया का सम्पदक दिखाने देगा।

    जवाब देंहटाएं
  6. Bahas chalti rahegi. Bateon se kuch hota to kya baat thi. Haan media chahe to Hinduon aur Muslimon ko ek sath baithne ka ek platform de, jo bahar to kahin aur milta nahin dikhta. Tab shayad kuch samadhan mile. Swagat.

    (gandhivichar.blogspot.com)

    जवाब देंहटाएं
  7. बहुत सुंदर...आपके इस सुंदर से चिटठे के साथ आपका ब्‍लाग जगत में स्‍वागत है.....आशा है , आप अपनी प्रतिभा से हिन्‍दी चिटठा जगत को समृद्ध करने और हिन्‍दी पाठको को ज्ञान बांटने के साथ साथ खुद भी सफलता प्राप्‍त करेंगे .....हमारी शुभकामनाएं आपके साथ हैं।

    जवाब देंहटाएं
  8. आपकी ये पोस्ट ख़ुद को बधाई के सिवा कुछ नही है....
    पत्रकारिता का मतलब सिर्फ़ ख़बर देने तक निश्चित होना चाहिए..........न की उस पर अपना विचार और टिप्पणी. क्यूंकि उनको मीडिया का माध्यम उपलब्ध hai..........उनके अपने उल्टे सीधे विचार सब को सुनने होंगे और उस पर पब्लिक openion unke hisaab se बने...............ये पत्रकारिता की सीमा का उलंघन है. किसी विशेष के प्रति झुकाव के साथ की गयी पत्रकारिता पेशे के साथ बगावत है.

    जवाब देंहटाएं
  9. "जख्‍म पर मरहम लगाने क्‍यों नहीं आते,
    गीत कोई गुनगुनाने क्‍यों नहीं आते,,

    आसमां से चांद तारे छीन लाऊंगा,
    हौसला मेरा बढ़ाने क्‍यों नहीं आते,,

    लाश अपनी ढो रहा हूं कब से कांधे पर,
    गिद्ध हो तुम मांस खाने क्‍यों नहीं आते,,

    मैं उबलता दूध बहने की हदों पर हूं,
    छींट पानी की लगाने क्‍यों नहीं आते,,"
    .....दोस्त!..... जगती आखों से स्वप्न देखना सिर्फ आपकी ही फितरत नहीं है।....आपको तलाशता आपके इलाके में जा पहुंचा....तो जो लिखा है वो उसी इलाके से 'साभार' है।....दोस्त!....आपकी बात पर आता हूं।....आपसे किसने कहा कि पत्रकारिता का मतलब सिर्फ सूचना देना है?.....क्या आपको लगता है कि जो हम देखते हैं/ महसूस करते हैं,....उसके बारे में कुछ न बोलें !!......हिंदू हो या मुसलिम,...दर्द और चीख की आवाज एक होती है।....आप दूर बैठे हिंदू/मुसलमां हो सकते हैं,.....लेकिन घटनाओं के साक्षी बनकर आप सिर्फ इन्सान रह जाते हैं।....बेशक, हर जगह कि तरह यहां भी सब 'सफेद' नहीं है।......लेकिन ख्वाब यहां कहीं ज्यादा देखे जाते हैं!!.....आपसे भी ज्यादा!!!!!!

    जवाब देंहटाएं